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UPSC का सपना



UPSC का सपना

(संजय कुमार की कहानी उनकी ही जुबानी)

UPSC का सपना
Sanjay Kumar

UPSC का सपना UPSC का सपना कब देखना शुरू किया दोस्तों   जिलाधिकारी अर्थात “क्लेक्टर ” ये शब्द पहली बार कक्षा 5 में सुना था। उस समय तो बहुत अल्पज्ञ था। बस ये पता चला था की बहुत बड़ा अधिकारी होता है। जैसे – जैसे कक्षाएं बढ़ती रही, मेरी जिलाधिकारी के बारे मे जानने की लालसा भी प्रबल होती गयी। कक्षा 9 तक पहुँचते हुए बहुत कुछ समझ आया लेकिन सब कुछ नहीं। अब ये मेरे लिए एक सपना बनने लगा था कि मै खुद को एक दिन क्लेक्टर के रुप मे देखूगाँ। लेकिन कहते है ना कि सपने और हकीकत मे जमीन – आसमान का अंतर होता है। कक्षा 12 में तो लगने लगा कि कब मैं जिलाधिकारी बनूगा। अब इसकी तैयारी के बारे मे विस्तृत जानने की इच्छा होने लगी। मै साइंस बैकग्राउंड का विद्यार्थी था तो सोचता भी था कि मै कैसे तैयारी करुगाँ। घर पर झुकाव इंजीनियरिंग कराने का था। बडे भइया इंजीनियरिंग कर भी रहें थे। मै अपनी दिव्यागंता के कारण इंजीनियरिंग करने में असमर्थ था। परिवार का इस बात पर मनोबल गिरा और चिंता भी होने लगी। लेकिन मेरे मन में कुछ और ही पल रहा था। मैनें फिर स्नातक कला वर्ग से करने का निर्णय लिया। और सिविस सेवा की तैयारी भी अपने स्तर पर शुरू कर दी। प्रारंभ में बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा। क्या पढ़ना है, कैसे पढ़ना है, कितना पढना है। कुछ भी नही पता था। बस ये पता था कि सामान्य अध्ययन पहले तैयार करना है। बड़ी भूमिका अदा करता है ये प्रारंभिक परीक्षा में। एक सपना हकीकत बन सकता है, लोग बनाते भी है। गीता का एक श्लोक मुझे बचपन से प्रभावित करता है – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मुझे पता कि सिविल सेवक बनने का सफर लम्बा हो सकता है लेकिन मै इस पथ पर दृढ़ रहूंगा। मै कोचिंग करने में असमर्थ था। वजह आर्थिक नही थी, वजह थी मेरी दिव्यागंता। लेकिन मैने इसको भी दरकिनार किया क्योकि मुझे लगता है कि दिव्यागंता मन की होती हैं तन की नहीं। मन से दिव्यागं हो गये तो आप कुछ नही कर पाओगे। कहते है एक सपने की शुरुआत दो आँखों से होती है लेकिन मै इसे भी नकारता हूँ क्योकि सपना तो एक अंधा व्यक्ति भी देखता होगा। फर्क सिर्फ ये रहेगा वो सपने का वर्णन नही कर सकता। तो बस यही बात मुझ पर लागू होती हैं कि आईएएस ही मेरा सपना बन गया। कभी मनचाही मुराद पूरी होती है तो कभी निराशा का भी सामना करना पडता है। फिर भी हम सपने देखना नहीं छोडते क्योंकि अंधेरे में भी रोशनी की एक किरण तलाशना हमारी फितरत है। लेकिन कोई मार्गदर्शन करने वाला नही मिला। छोटी- छोटी चीजे भी बड़ी बाधक होती है। स्नातक पूरा कर लिया। फिर वो दिन आ ही गया कि अब मै प्रतियोगी के रुप में मैदान मे उतरु,सो उतर गया। मैने पहले से ही समझ लिया था कि मेरा सपना मेरा ही नही मेरे परिवार का भी है। मै जो करुगाँ उससे परिवार को भी खुशी मिलेगी। घर पर ही बैठकर तैयारी करने लगा। पहले छोटी छोटी चीजें समझी। कैसे क्यो क्या कहाँ। कुछ अन्य परीक्षाए भी देने लगा। मुुझे शुरुआत से लगता था सिविल की तैयारी सब कुछ झौकना पडेगा। मै इसके लिए खुद को तैयार भी कर चुका था।
मैं 2018 सिविल सेवा परीक्षा में तीसरे बार उपस्थित हुआ हूँ और मुझे आशा है कि इस बार मैं इस बार अपना सपना साकार कर लूगां और साक्षात्कार स्तर तक पहुंच जाऊंगा। मैंने 2014 में अपना पहला प्रयास पहले ही बर्बाद कर दिया है जब मैं अपने ज्ञान का परीक्षण करने के एकमात्र उद्देश्य के साथ दिखाई दिया था, इसी बीच 2015 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में PO के रूप में चयनित कर लिया गया आत्मविश्वास बढ़ा इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन 2 साल के लिए समर्पित रूप से तैयार करने और 2017 में प्रारम्भिक, मुख्य परीक्षा को सफलतापूर्वक करते हुए जब साक्षात्कार तक पहुँचा तो उसके बाद, मुझे पूरा भरोसा हुआ कि 2017 में मैं खुद ही सक्षम हूं मेरे आईएएस सपने को पूरा करने में, जिसके लिए मुझे अभी और समय लगेगा शायद 2018 के बाद ना भी लगे लेकिन अपनी डगर पर दृढ़ रहूंगा क्योकि अंतिम लक्ष्य मेरा यही है।

UPSC का सपना
मैंने मूल रूप से सोचा था कि मुझे केवल मुख्य स्तर के लिए और अधिक दिशा और मार्गदर्शन की आवश्यकता है, लेकिन अब पूरे पाठ्यक्रम को चुनने के बाद मुझे एक नया नया परिप्रेक्ष्य महसूस हुआ जो यूपीएससी के लिए आवश्यक है और प्रयास करते समय प्रशंसनीय गुणों और दृष्टिकोण प्राप्त करने के महत्वपूर्ण सुझाव देता रहूंगा। मै यह कभी नही सोचता हूँ कि मैंने बहुत सीख लिया है बल्कि यह कहूँगा कि अभी तो ये शुरुआत है। सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नही होती और समाप्त होनी भी नही चाहिए वरना उत्कृष्ट निष्कर्ष कैसे प्राप्त होगें।
वर्तमान में RBI Grade 2 में प्रशिक्षण ले रहा हूँ।

UPSC का सपना
धन्यवाद

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संजय कुमार

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